(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.375. अध्यायः 375
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरंप्रत्युञ्छवृत्त्युपाख्यानोपदेशपरम्पराक्रमकथनपूर्वकमुञ्छवृत्तिब्राह्मणस्य वनप्रवेशकथनम्॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

भीष्म उवाच। 12-375-0x(6682)(80741)
स चामन्त्र्योरगश्रेष्ठं ब्राह्मणः कृतनिश्चयः।
दीक्षाकाङ्क्षी तदा राजंश्च्यवनं भार्गवं श्रितः॥ 12-375-1(80742)
स तेन कृतसत्कारो धर्ममेवाधितस्थिवान्।
तथैव च कथामेतां राजन्कथितवांस्तदा॥ 12-375-2(80743)
भार्गवेणापि राजेन्द्र जनकस्य निवेशने।
कथैषा कथिता पुण्या नारदाय महात्मने॥ 12-375-3(80744)
नारदेनापि राजेन्द्र देवेन्द्रस्य निवेशने।
कथिता भरतश्रेष्ठ पृष्टेनाक्लिष्टकर्मणा॥ 12-375-4(80745)
देवराजेन च पुरा कथितैषा कथा शुभा।
समस्तेभ्यः प्रशस्तेभ्यो विप्रेभ्यो वसुधाधिप॥ 12-375-5(80746)
यदा च मम रामेण युद्धमासीत्सुदारुणम्।
वसुभिश्च तदा राजन्कथेयं कथिता मम॥ 12-375-6(80747)
पृच्छमानाय तत्त्वेन मया चैवोत्तमा तव।
कथेयं कथिता पुण्या धर्म्या धर्मभृतांवर॥ 12-375-7(80748)
तदेव परमो धर्मो यन्मां पृच्छसि भारत।
आसीद्धीरो ह्यनाकाङ्क्षी धर्मार्थकरणे नृप॥ 12-375-8(80749)
स च किल कृतनिश्चयो द्विजो
भुजगपतिप्रतिदशितात्मकृत्यः।
यमनियमसहो वनान्तरं
परिगणितोञ्छशिलाशनः प्रविष्टः॥ ॥ 12-375-9(80750)

इति श्रीमन्महाभारते शतसाहस्रिकायां संहितायां वैयासिक्यां शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने पञ्चसप्तत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः॥ 375॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-375-7 मयाप्यद्य तवानद्येति ट. पाठः॥ 12-375-9 यमा अहिंसादयः नियमाः शौचादयः। वनान्तरं वनमध्यं प्रविष्टः। उञ्छः कणश आदानं कणिशाद्यर्जनं शिलम्। परिगणितं परिमितमुञ्छशिलार्जितमन्नमश्नन् फणिपत्युक्तामुञ्छवृत्तेर्गतिं प्रापेति शेषः। शमनियमसमाहितो वनान्तमिति ट. पाठः॥ समाप्तं च मोक्षधर्मपर्व ॥ 3॥ शान्तिपर्व च समाप्तम्॥ 12॥ अस्यानन्तरमनुशासनपर्व भविष्यति तस्मायमाद्यः श्लोकः।

`शरतल्पे महात्मानं शयानमपराजितम्। युधिष्ठिर उपागम्य प्रणिपत्येदमब्रवीत्॥' 13-1-1x (6719)


Mahabharat- Hindi (Devanagari) 100000 shlokas

www.sanatanadharm.com - play store app (sanatana dharm)

"Bharathiya Sanatana Dharm" and Sanatana Dharmam & Dharmo rakshati Rakshitha logo are our trademarks. Unauthorised use of "Sanatana Dharmam & Dharmo rakshoati Rakshitha" and the logo is not allowed. Copyright © sanatanadharm.com All Rights Reserved . Made in India.